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विरासत

1847 ईस्वी में रुडकी कॉलेज की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य के प्रथम इंजीनियरिंग कॉलेज के रूप में हुयी । 1854 में इस कॉलेज को थॉमसन कॉलेज ऑफ सिविल इंजीनियरिंग के रूप में पुनर्नामित किया गया । इस कॉलेज के प्रदर्शन इसकी क्षमता तथा स्वतंत्र हुये भारत की आवश्यकता को देखते हुये  सयुंक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश ) के 1948 के अधिनियम संख्या IX द्वारा इसे विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया गया । नवम्बर 1949 में इस पूर्ववर्ती कॉलेज को स्वतंत्र भारत के प्रथम इंजीनियरिंग कॉलेज के रूप में उन्नत करते हुये भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने चार्टर प्रदान किया । 

अपनी स्थापना  के समय से ही रुड़की विश्वविद्यालय ने देश को तकनीकी जनशक्ति एवं ज्ञान उपलब्ध कराने व शोध कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है । यह विश्वविद्यालय विश्व के सर्वोत्तम प्रौद्योगिकी संस्थानों के बीच अपना स्थान बनाए रहा तथा प्रौद्योगिकी विकास के सभी क्षेत्रों में इसने अपना योगदान दिया । विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा इंजीनियरिंग के क्षेत्र में इसे शिक्षा एवं शोध जगत का दिशा निर्धारक भी माना जाता है । अक्टूबर 1996 में किसी न किसी रूप में अपना अस्तित्व बनाय हुये इस विश्वविद्यालय ने अपनी स्थापना के 150 वें वर्ष में प्रवेश किया । 

21 सितंबर 2001 को संसद में पास किए गये एक बिल के द्वारा इस विश्वविद्यालय को रुड़की विश्वविद्यालय से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के रूप में बदलते हुये  राष्ट्रीय महत्व का एक संस्थान घोषित किया गया । व इस तरह इस संस्थान के इतिहास के  पहले से ही चमकते हुये ताज में एक रत्न और जड़ दिया गया ।  

संस्थान में इंजीनियरी तथा वास्तुकला की 10 शाखाओं में स्नातक उपाधि पाठ्यक्रम व इंजीनयरी, प्रयुक्त विज्ञान एवं वास्तुकला तथा नियोजन की 55 शाखाओं में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम चलाये जाते हैं । संस्थान के सभी विभागों एवं शोध केन्द्रों में डाक्टरल कार्य की सुविधा है ।  

यह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान समस्त भारत के विभिन्न केन्द्रों पर संचालित आईआईटी -जेईई परीक्षा के माध्यम से बी .टैक . तथा बी .आर्क. पाठ्यक्रमों में छात्रों को प्रवेश देता है ।