चमकते सितारे
भा.प्रौ.सं.रु. के लब्ध प्रतिष्ठ पूर्वछात्र
Sir Ganga Ram
सर गंगा राम (1873) ने थोड़े दिनों तक पंजाब लोक निर्माण विभाग में नौकरी के बाद स्वयं को व्यावहारिक खेती के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने मांटगोमरी जिले में 50,000 एकड़ बंजर और असिंचित भूमि सरकार से लीज पर प्राप्त की, और मात्र तीन वर्षों के भीतर उस विशाल रेगिस्तान को हरी-भरी फसलों वाले मुस्कुराते हुए उपजाऊ क्षेत्र में बदल दिया। यह काम उन्होंने अपने ही द्वारा लगाए गए एक जल विद्युत संयंत्र के जरिए किया। संयंत्र से निकाले गए जल के माध्यम से उन्होंने लगभग एक हजार मील की सिंचाई व्यवस्था शृंखलाबद्ध की और यह सब उन्होंने अपने निजी खर्च से किया। यह देश में अपनी तरह का पहला सबसे बड़ा निजी उद्यम था। इस तरह के उद्यम के बारे में पहले कभी न तो जाना गया था और न ही सोचा गया था।
सर गंगा राम ने लाखों रुपये अर्जित किए, जिसमें से अधिकांश उन्होंने दान कर दिया। पंजाब के तत्कालीन गवर्नरसर मैल्कॉम हैली के शब्दों में, "उन्होंने एक नायक की तरह जीता और एक संत की तरह दान कर दिया।" वह एक महान अभियंता होने के साथ-साथ महान दानवीर भी थे।
Raja Jwala Prasad
संस्थान के अत्यंत मेधावी और लब्धप्रतिष्ठ पूर्व छात्रों में एक अन्य नाम राजा ज्वाला प्रसाद (1900) का है, जो 1929 में उत्तर प्रदेश (उन दिनों संयुक्त प्रांत) सिंचाई विभाग के मुख्य इंजीनियर बने और जिन्हें सरकार द्वारा राजा की उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्होंने 1924 में गंग नहर ग्रिड योजना तैयार की। 1932 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के बिजनौर में एक चीनी मिल और एक कृषि फर्म की स्थापना की। वह थॉमसन कॉलेज पुनर्गठन समिति के अध्यक्ष (1938-39) थे।
Sir Lakshmi Pati Misra
सर लक्ष्मी पति मिश्र (1911) ध्वनि अभियांत्रिकी के क्षेत्र में अपने कौशल के साथ-साथ कई अन्य गुणों के भी स्वामी थे। एक उत्साही खिलाड़ी और एक प्रतिभासंपन्न वार्ताकार श्री मिश्र ने 34 साल तक भारतीय रेलवे को अपनी अत्यंत विशिष्ट सेवाएँ प्रदान कीं और मुख्य आयुक्त के उच्चतम पद तक पहुँचे। अपनी मातृ संस्था से उनका लगाव अंतरंग और स्नेहपूर्ण था।
Shri K.N. Agarwala
थॉमसन कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के पूर्व छात्र (1911-14) श्री के.एन. अग्रवाल आई.एस.ई. ने 'आत्मत्याग' और "पेशेवर उत्कृष्टता, उच्च निष्ठा और देशभक्ति" के आदर्श वाक्य के साथ काम किया। 1914 में स्नातक होने के बाद वे बीएचयू की स्थापना के समय से ही डिजाइन, निर्माण और प्रबंधन के एकमात्र प्रभारी इंजीनियर के रूप में पंडित मदन मोहन मालवीय के साथ जुड़ गए। सन् 1914-1920 के बीच वे बनारस के घाटों के विकासकार्य से भी संबद्ध रहे। सन् 1914-1920 के दौरान ही आई.एस.ई. सेवा सेवा छोड़कर उन्होंने पंजाब में सर गंगा राम के साथ काम किया। बाद में, यूपी सिंचाई सेवा में उन्होंने कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त किए, नामतः 1928 में आगरा और अवध के राज्यपाल से शारदा नहर के निर्माण के लिए एक सनद और भारत के वायसराय से एक स्वर्ण पदक प्राप्त किया। अपने करियर के शीर्ष पर और सेवा में एक उभरते सितारे के रूप में, उनकी देशभक्ति की भावना के कारण निजी हित के सोच से ऊपर उठ कर 1937 में वे गांधीजी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए और चरखे की कताई सहित स्वतंत्रता आंदोलन के रचनात्मक और शांतिपूर्ण पहलुओं में खुद को तल्लीन हो गए। 1940 में बंबई में आपातकाल (द्वितीय विश्व युद्ध) के दौरान, सच्ची गांधीवादी भावना से, उन्होंने स्वेच्छा से राज्यपाल को अपनी सेवाएं दीं और हवाई हमले के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों के लिए वार्डन के रूप में कार्य किया।
स्वतंत्रता प्राप्ति के मात्र कुछ ही माह पूर्व 1947 में हृदयगति रुक जाने से उनका निधन हो गया और देश का यह सिपाही अपने सपनों के अनुरूप राष्ट्र का वह विकास होते हुए देखने से वंचित रह गया जिसके लिए उन्होंने जीवन भर काम किया।
Dr.A.N.Khosla
डॉ. ए.एन. खोसला (1916) एक सक्रिय युगद्रष्टा और उच्च स्तर के अभियंता थे। उन्होंने नदियों और चौड़ी घाटियों में सटीक समतलीकरण के लिए खोसला डिस्क का विकास किया तथा 'डिजाइन ऑफ वीअर्स ऑन पर्मिएबल फाउंडेशंस' शीर्षक महत्वपूर्ण कृति की रचना की। भाखड़ा नांगल परियोजना के जनक एवं देश में कई अन्य नदी घाटी परियोजनाओं के मूल में प्रेरक तत्व की भूमिका निभाने वाले डॉ. खोसला ने केंद्रीय जलमार्ग, सिंचाई और नौकायन आयोग के अध्यक्ष तथा बाद में 1954 से 1959 तक विश्वविद्यालय के उप कुलपति के रूप में कार्य किया।
डॉ. खोसला ने विश्वविद्यालय का रूप ही बदल दिया। उन्होंने इसे नए सिरे से उभरते भारत में निभाने के लिए एक नई भूमिका और प्रतिष्ठा दी। वह पहले अभियंता थे जिन्हें बाद में उड़ीसा (1962-68) के राज्यपाल जैसे गरिमापूर्ण पदभार संभालने का अवसर प्राप्त हुआ था। उन्होंने खोसला अनुसंधान पुरस्कारों की स्थापना के लिए परामर्श कार्य से हुई अपनी अधिकांश आय दान कर दी थी।
Dr. Ghananand Pande
डॉ. घनानंद पांडे (1925) ने भारतीय रेलवे से संबद्ध हुए और महाप्रबंधक के रूप में सेवाएँ प्रदान कर अपना विशिष्ट स्थान बनाया। इस कार्यकाल में गंगा पर मोकामा पुल का निर्माण उनकी विशिष्ट उपलब्धि रही। बाद में वे रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में 1956 में सेवानिवृत्त हुए। इसके उपरांत वे 1957-60 तक हिंदुस्तान स्टील्स के अध्यक्ष रहे। यही वह समय है जब सार्वजनिक क्षेत्र के इस्पात उद्योग की स्थापना हुई थी। उन्होंने 1960-61 में बेबी कार परियोजना के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हुए छोटी कारों के निर्माण की सिफारिश की। वे 1961-66 तक रुड़की विश्वविद्यालय के उप कुलपति रहे।
Dr. Jai Krishna
डॉ. जय कृष्ण (1935) ने संरचनात्मक गतिविज्ञान के अध्ययन और अनुप्रयोग का बीड़ा उठाया और रुड़की विश्वविद्यालय में भूकंप अभियांत्रिकी में अनुसंधान और प्रशिक्षण विद्यापीठ (जिसे बाद में भूकंप अभियांत्रिकी विभाग कहा गया) की स्थापना की। पूरे भारत में भूकंप की दृष्टि से सुरक्षित बड़ी संरचनाओं की डिजाइन संबंधी कई परियोजनाओं के सलाहकार रहे। जापान सोसायटी ऑफ डिजास्टर प्रिवेंशन, 1988 के अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार, सीएसआईआर के शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार, इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया) के राष्ट्रीय डिजाइन पुरस्कार, पद्म भूषण सहित कई पुरस्कारों के प्राप्तकर्ता।
Sri. Ved Mitra Manglik
1940 के दशक में उत्तीर्ण होने वालों में प्रमुख थे श्री वेद मित्र मांगलिक (1940), जो उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता बने। अपने करियर के दौरान उन्होंने उतर प्रदेश में कई बड़े बाँधों और प्रमुख जल संसाधन परियोजनाओं के नियोजन और निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया। 1960 के दशक के मध्य में उन्होंने गंगा और उसकी सहायक नदियों तथा यमुना नदी पर जलविद्युत विकास संबंधी कुछ परियोजनाओं के लिए एकीकृत महायोजना तैयार की। अतुल्य निष्ठा और साहस के लिए उनकी बहुत प्रशंसा हुई। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। एक प्रेरक और दयालु अगुआ के रूप में उन्होंने काफी समय से ठप पड़ी विशाल सिंचाई परियोजना रामगंगा बाँध को केवल दो साल के रिकॉर्ड समय में पूरा करके उसे चालू भी कर दिया। वे प्रकृति और पौधों के बारे में अपनी गहरी रुचि और ज्ञान के साथ-साथ बागवानी में अपने जुनून और विशेषज्ञता के लि
Dr. Anand Swarup Arya
डॉ. आनंद स्वरूप आर्य (1953) संरचनात्मक अभियांत्रिकी, भूकंप, मृदा और फाउंडेशन इंजीनियरिंग के विशेषज्ञ हैं। अनुसंधान, डिजाइन और परामर्श कार्य का इनका एक लंबा और विशिष्ट रिकॉर्ड है। इन्हें फिक्की (फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) पुरस्कार (1986) और इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया) (1987) का राष्ट्रीय डिजाइन पुरस्कार प्राप्त हुआ। यूनेस्को और कई अन्य अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों में भागीदार, और भूकंप इंजीनियरिंग में विशेषज्ञ के रूप में कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडलों के सदस्य। निदेशक, इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर अर्थक्वेक इंजीनियरिंग, 1977-80, 1980-84। फेलो, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी और भारतीय राष्ट्रीय इंजीनियरिंग अकादमी।
Dr. S.K. Khanna
डॉ. एस.के. खन्ना (1958) ने 40 से अधिक वर्षों की लंबी अवधि तक राजमार्ग और परिवहन अभियांत्रिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वह 1993 में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के पहले पूर्णकालिक अध्यक्ष थे। इससे पहले, उन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया, और 1984 से 1990 तक इसके सचिव रहे। वे भारत में उच्च और तकनीकी शिक्षा के मानकों के समुचित अनुपालन और विकास के लिए जिम्मेदार थे। उन्होंने उच्च तकनीकी शिक्षा के लिए नई शिक्षा नीति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अन्य
लाला दीन दयाल (जिन्हें राजा दीन दयाल के नाम से भी जाना जाता है), 1866 बैच के एक भारतीय फोटोग्राफर थे। उनका करियर 1870 के दशक के मध्य में एक मान्यता प्राप्त फोटोग्राफर के रूप में शुरू हुआ। वह हैदराबाद के छठे निज़ाम, महबूब अली खान, आसिफ जाह छठवें के दरबारी फोटोग्राफर बने, जिन्होंने उन्हें मुसव्विर जंग राजा बहादुर की उपाधि से सम्मानित किया। बाद में, 1885 में उनकी नियुक्ति भारत के वायसराय के फोटोग्राफर के रूप में हो गई। उन्हें 1897 में रानी विक्टोरिया से रॉयल वारंट प्राप्त हुआ। 1905-1906 में राजा दीन दयाल वेल्स के राजकुमार और राजकुमारी के साथ शाही दौरे पर गए। संचार मंत्रालय, डाक विभाग ने भी उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया है। लाला दीन दयाल का जन्म उत्तर प्रदेश में मेरठ के पास स्थित सरधना में जौहरियों के एक जैन परिवार में हुआ था। उनकी स्मृति में एक लाला दीन दयाल ट्रस्ट भी है। उनकी चौथी पीढ़ी के वंशजों से हैदराबाद में संपर्क किया जा सकता है।
1872 बैच के सर विलियम विलकॉक्स ने जानपद अभियांत्रिकी (ससम्मान) की उपाधि प्राप्त की और अपने बैच में प्रथम स्थान पर रहे (शायद उसी वर्ष डिग्री कोर्स शुरू किया गया था- इस तथ्य की पुष्टि नहीं हुई है)। मिस्र में उनका अपना इंजीनियरिंग का कार्य था। उन्होंने शुरुआत असुइट बैराज के डिजाइन की, जो दोआबे में वितरण के लिए नील के पानी को रोकने का काम करता था। उन्हें एक पारंपरिक बाँध बनाने का काम सौंपा गया था। उन्होंने एक बांध तैयार किया जो बाढ़ के मौसम के दौरान गाद से भरे पानी को बाहर निकल जाने देता था और बाद में मौसम में बहने वाले स्वच्छ जल को भंडारण के लिए रोक लेता था। दो किमी लंबा और 40 मीटर ऊंचा पहला असवान बांध 1902 में बनकर तैयार हुआ था, जो उस समय के अभियांत्रिकी जगत की एक बड़ी उपलब्धि थी, जिसके लिए उन्हें नाइट की उपाधि दी गई थी।
1927 बैच के प्रतिष्ठित इंजीनियर श्री एन डी गुलाटी को उनकी सेवाओं के लिए 1961 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। उन्हें सिंचाई और जल निकासी पर अंतरराष्ट्रीय आयोग का "जनक" कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने ही इस संगठन की कल्पना की थी। इसके अलावा, उन्हें भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 की सिंधु जल संधि में मध्यस्थता के लिए भी जाना जाता है।
1920 के तथाकथित प्रतिष्ठित दशक के दौरान संस्थान ने कई प्रतिष्ठित इंजीनियरों का निर्माण किया। इनमें से एक थे कुंवर सेन (1922), जिन्होंने राजस्थान नहर और थाईलैंड में मिकांग घाटी विकास से संबंधित परियोजनाओं के नियोजन में योगदान किया। ए.सी. मित्रा (1923) ने यमुना और गंगा की सिंचाई और बिजली प्रणालियों के विकास में योगदान किया और बाद में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के प्रमुख अभियंता बने। के.एन. कठपालिया (1924), थॉमसन कॉलेज पर फोर्टेस्क्यू कमेटी के सदस्य-सचिव थे, रुड़की विश्वविद्यालय अधिनियम 1948 के प्रारूपण से जुड़े और बाद में रुड़की विश्वविद्यालय के प्रति उप कुलपति (1957-61), उप कुलपति (1959-61) के रूप में भी कार्य किया। पी.एल. वर्मा (1924), ने चंडीगढ़ की योजना बनाई और निर्माण किया। एल.पी. भार्गव (1925), ने बाँधों के लिए उन्नत द्वारों का डिजाइन और निर्माण किया। करनैल सिंह (1927), ने 1947 में असम रेल लिंक का निर्माण किया, चितरंजन लोकोमोटिव वर्क्स का निर्माण किया और रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष बने। यादव मोहन (1928), को रिहंद बांध की योजना और डिजाइन और राजस्थान नहर के सबसे कठिन हिस्से के निर्माण का श्रेय जाता है। एच.पी. सिन्हा (1928) ने बैंकॉक से इस्तांबुल तक ट्रांस-एशियन हाइवे के लिए प्रोजेक्ट तैयार किया। डी.सी. बैजल (1929), रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष और भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स के अध्यक्ष बने। इसी दशक ने विश्वविद्यालय के दो भावी कुलपति - जी. पांडे (1925) और एम. आर. चोपड़ा (1929) भी प्रदान किए।
डॉ. जी. पांडे ने क्रमशः लगातार सँभाले गए तीन उच्च पदों को गरिमा प्रदान की - अध्यक्ष, रेलवे बोर्ड; अध्यक्ष, हिंदुस्तान स्टील; और उप कुलपति, रुड़की विश्वविद्यालय (1961-66)। उनके कार्यकाल में भारतीय रेल की प्रतिष्ठा चरम पर थी। यह भी उनके कार्यकाल में ही संभव हो सका कि भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर में सार्वजनिक क्षेत्र के तीन इस्पात संयंत्र स्थापित और चालू किए गए। डॉ. एम.आर. चोपड़ा महाप्रबंधक के रूप में विशाल भाखड़ा बांध परियोजना को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद केंद्रीय जल और विद्युत आयोग के अध्यक्ष और बाद में विश्वविद्यालय के कुलपति (1966-71) बने। डॉ. जी. पांडे और डॉ. एम. आर. चोपड़ा ने अपने प्रशासनिक कौशल के साथ, विश्वविद्यालय को इंजीनियरिंग शिक्षा के अग्रणी केंद्रों में से एक बना दिया - भीतर से चुस्त और बाहर प्रतिष्ठित।
1930 के दशक के सबसे मेधावी, डॉ जयकृष्ण (1935) ने 1939 में शिक्षक के रूप में कॉलेज से जुड़े और 1971 से 1977 तक विश्वविद्यालय के उप कुलपति रहे। उन्होंने दुनिया भर में एक इंजीनियर-वैज्ञानिक के रूप में भूकंप अभियांत्रिकी में अनुसंधान और प्रशिक्षण विद्यापीठ के संस्थापक तथा निदेशक और कई प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान प्राप्तकर्ता के रूप में वैश्विक ख्याति अर्जित की।
1940 के दशक में उत्तीर्ण होने वालों में प्रमुख थे श्री वेद मित्र मांगलिक (1940), जो उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता बने। अपने करियर के दौरान उन्होंने उतर प्रदेश में कई बड़े बाँधों और प्रमुख जल संसाधन परियोजनाओं के नियोजन और निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया। 1960 के दशक के मध्य में उन्होंने गंगा और उसकी सहायक नदियों तथा यमुना नदी पर जलविद्युत विकास संबंधी कुछ परियोजनाओं के लिए एकीकृत महायोजना तैयार की। अतुल्य निष्ठा और साहस के लिए उनकी बहुत प्रशंसा हुई। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। एक प्रेरक और दयालु अगुआ के रूप में उन्होंने काफी समय से ठप पड़ी विशाल सिंचाई परियोजना रामगंगा बाँध को केवल दो साल के रिकॉर्ड समय में पूरा करके उसे चालू भी कर दिया। वे प्रकृति और पौधों के बारे में अपनी गहरी रुचि और ज्ञान के साथ-साथ बागवानी में अपने जुनून और विशेषज्ञता के लिए भी जाने जाते थे। एक बार वरिष्ठ अधिकारियों के एक सम्मेलन के दौरान सिंचाई विभाग के मंत्री ने उनसे उनकी असाधारण प्रभावशीलता का रहस्य पूछा, तो उन्होंने उत्तर दिया, "मैं हाथ में तो हमेशा एक लोहे का डंडा लिए रहता हूँ, लेकिन मेरा दिल गुलाब की पंखुड़ी की तरह कोमल है।" डॉ. ओ.पी. जैन (1944), एक उत्कृष्ट संरचनात्मक डिज़ाइन इंजीनियर, ने विश्वविद्यालय में एक लंबी और विशिष्ट सेवा के बाद, , आईआईटी दिल्ली के निदेशक (1978-83) के रूप में कार्य किया। श्री दिनेश मोहन (1943), अपेक्षाकृत कम उम्र में सी.बी.आर.आई. रुड़की के निदेशक बने और संस्थान को अत्यधिक उत्कृष्ट सेवा प्रदान की। सिंचाई और बांधों के एक प्रसिद्ध विशेषज्ञ डॉ. भरत सिंह (1945) विश्वविद्यालय के कुलपति (1982-86) रहे। श्री देश राज सिंघा (1946) ने उत्तर प्रदेश में सहायक अभियंता के रूप में अपना करियर शुरू किया
1950 के दशक में उत्तीर्ण होने वालों में प्रमुख श्री आर.के. जैन (1951) ने एक दायित्वपूर्ण पद सँभाला और उत्तरोत्तर अधिक दायित्व का निर्वहन करते हुए रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के पद तक पहुँचे। डॉ. दिग्विजय सिंह (1956) ने रुड़की विश्वविद्यालय में यांत्रिक अभियांत्रिकी में व्याख्याता के रूप में अपना करियर शुरू किया और रुड़की विश्वविद्यालय के कुलपति के प्रतिष्ठित पद तक पहुंचे। वे केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान के निदेशक, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के उपाध्यक्ष थे। श्री कृष्ण कुमार जैन (1957), ने यूएसए में एक्रोन, ओहियो में एक सेतु अभियंता के रूप में अपना पेशेवर करियर शुरू किया। 1974 में, श्री जैन नेपल्स, फ्लोरिडा चले गए और क्रिस जैन एंड एसोसिएट्स नाम से अपनी स्ट्रक्चरल कंसल्टिंग फर्म शुरू की। श्री जे.एन. लांबा (1957) ने बढ़ती जिम्मेदारी के पदों पर कार्य किया और भारतीय रेलवे में महाप्रबंधक के पद तक पहुंचे। श्री अशोक भटनागर (1957) ने उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता के रूप में कार्य किया। बाद में अध्यक्ष, रेलवे बोर्ड और भारत सरकार के प्रधान सचिव के पद तक पहुँचे। वह आई.ए.एस. संबंद्ध सेवा परीक्षा के माध्यम से यह गौरव (प्रमुख सचिव) प्राप्त करने वाले एकमात्र थॉमसनियन हैं और पिछले 60 वर्षों में 1947 बैचों के बाद केवल दूसरे थॉमसनियन। श्री नरेंद्र कुमार मित्तल (1957) ने यूपीपीडब्ल्यूडी में एक अपरेंटिस इंजीनियर के रूप में अपना करियर शुरू किया और प्रबंध निदेशक, उत्तर प्रदेश निर्माण निगम के पद तक पहुँचे। डॉ. सतीश चंद्र (1957) राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की के निदेशक थे। श्री हरिहर शरण अग्रवाल (1957) ने 1957 में सिंचाई विभाग से अपना करियर शुरू किया और रेलवे बोर्ड के अतिरिक्त सदस्य स्तर तक पहुँचे। वे रेलवे पर आरक्षण और माल संचालन की जानकारी के कंप्यूटरीकरण से भी जुड़े थे। श्री रवींद्र कुमार (1957) ने सहायक अभियंता के रूप में अपना करियर शुरू किया और उत्तर प्रदेश राज्य पुल निगम के प्रबंध निदेशक के स्तर तक पहुँचे। श्री नरेंद्र सहाय बिसारिया (1957) ने रुड़की विश्वविद्यालय में सिविल इंजीनियरिंग में व्याख्याता के रूप में अपना करियर शुरू किया और देश के सर्वोच्च सिविल इंजीनियरिंग संगठन, केंद्रीय जल आयोग में निदेशक के स्तर तक पहुँचे। श्री ओम प्रकाश कुलश्रेष्ठ (1957) ने रुड़की विश्वविद्यालय में विद्युत अभियांत्रिकी में व्याख्याता के रूप में अपना करियर शुरू किया। वे श्रीलंका में सीलोन कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी के विकास के लिए विद्युत अभियांत्रिकी में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में यूनेस्को में शामिल हुए। श्री शैलेंद्र कुमार हजेला (1957) ने रुड़की विश्वविद्यालय में व्याख्याता के रूप में अपना करियर शुरू किया और एक संक्षिप्त कार्यकाल के बाद, उन्हें पीएचडी हेतु एलएलमिनाउ स्थित तकनीकी विश्वविद्यालय में अनुसंधान के लिए भारत सरकार द्वारा प्रायोजित कर दिया गया। उन्हें 1957 में रुड़की विश्वविद्यालय द्वारा विद्युत अभियांत्रिकी में सर्वश्रेष्ठ अभियांत्रिकी परियोजना डिजाइन के लिए स्वर्ण पदक और सबसे प्रतिष्ठित छात्र होने के लिए थॉमसन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। श्री देवी कृष्ण गुप्त (1957) दूरसंचार आयोग, दूरसंचार विभाग के सदस्य थे। श्री जगत प्रकाश गर्ग (1957) ने 1960 में भारतीय दूरसंचार सेवा (आईटीएस) से अपना करियर शुरू किया और भारत के दूरसंचार संचार के वरिष्ठ उप महानिदेशक के पद तक पहुँचे, जो भारत सरकार के अतिरिक्त सचिव के स्तर का पद है। डॉ. श्याम बहादुर (1957) ने रुड़की विश्वविद्यालय में व्याख्याता के रूप में अपना करियर शुरू किया और यूएसए स्थित लो स्टेट यूनिवर्सिटी के यांत्रिक अभियांत्रिकी विभाग में यूनिवर्सिटी प्रोफेसर पद तक पहुँचे। वह सिग्मा शी, पाई ताऊ सिग्मा, फी कप्पा फी, रैकहम फैलोशिप, मिशिगन विश्वविद्यालय, एन आर्बर के सदस्य थे। श्री हर नारायण (1957) आपूर्ति और निपटान महानिदेशालय में निदेशक के रूप में सेवानिवृत्त हुए। डॉ. राजिंदर कुमार सूरी (1957) ने रुड़की विश्वविद्यालय में यांत्रिक अभियांत्रिकी विभाग में व्याख्याता के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। वे फेडरर्स लॉयड के चीफ वर्क्स एक्जीक्यूटिव थे। 1973 में, उन्हें सीएसआईआर संगठन, सीएमईआरआई, दुर्गापुर के निदेशक के रूप में कार्यभार सँभालने के लिए चुना गया था। इसके बजाय उन्होंने नए और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर बीएचईएल के अनुसंधान कार्यक्रम की स्थापना के लिए भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल), नई दिल्ली से जुड़ना पसंद किया। श्री बी.सी. श्रीवास्तव (1957) ने अपने करियर की शुरुआत यूपी सिंचाई विभाग से की थी। बाद में उन्होंने यांत्रिक अभियांत्रिकी विभाग में व्याख्याता के रूप में रुड़की विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। उन्होंने दिल्ली राज्य उद्योग विकास निगम (डीएसआईडीसी) के महाप्रबंधक और राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (NSIC) के कार्यकारी निदेशक के रूप में काम किया। 1984 के दौरान वे विश्व बैंक में शामिल हुए और बाद में संयुक्त राष्ट्र में चले गए। उन्होंने दस वर्षों से अधिक समय तक विभिन्न देशों में सेवा की। प्रारंभ में वह मुख्य तकनीकी सलाहकार थे, लेकिन अंत में एक राजनयिक रैंक में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के निदेशक के रूप में सेवानिवृत्त हुए, लेकिन उसके बाद संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक के मानद सलाहकार बने रहे।
1960 के दशक में उत्तीर्ण होने वालों में प्रमुख हैं श्री वी.के. अग्निहोत्री (1960) जो रेलवे बोर्ड में सदस्य इंजीनियरिंग थे। डॉ. विजय कुमार (1961) सदस्य (प्रौद्योगिकी) दूरसंचार आयोग और भारत सरकार के पदेन सचिव, की दूरसंचार सेवाओं के उदारीकरण, दूरसंचार उपकरणों के निर्माण और देश में दूरसंचार के तीव्र विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। श्री सुबोध भार्गव (1962) ने बामर लॉरी एंड कंपनी, कलकत्ता के साथ अपना करियर शुरू किया और आयशर ग्रुप ऑफ़ कंपनीज़ में ग्रुप चेयरमैन और मुख्य कार्यकारी के स्तर तक पहुँचे। वह भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) और एसोसिएशन ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स के पूर्व अध्यक्ष और ट्रैक्टर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष हैं। श्री प्रदीप बैजल (1963) ने विभिन्न पदों पर मध्य प्रदेश राज्य की सेवा की। वह विशेष/अतिरिक्त/संयुक्त सचिव, विद्युत मंत्रालय थे। वह विनिवेश मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। श्री अरविंद शर्मा (1963) रेलवे बोर्ड के में सदस्य (विद्युत) थे। श्री अशोक सूटा (1963) विप्रो इनफोटेक के अध्यक्ष थे, आईवाई उद्योग के लिए प्रधान मंत्री की टास्क फोर्स और विश्व बौद्धिक संपदा संगठन, जिनेवा के लिए सलाहकार परिषद में कार्यरत थे। श्री सूटा को 1992 में इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट इंडस्ट्रीज एसोसिएशन द्वारा वर्ष का इलेक्ट्रॉनिक्स मैन, 1994 में आईटी मैन ऑफ द ईयर और कंप्यूटरवर्ल्ड पत्रिका द्वारा 1997 में आईटी मैन ऑफ द ईयर नामित किया गया था। श्री आर.के. सिंह (1966) इंडियन रेलवे सर्विस ऑफ़ इंजीनियर्स (आईआरएसई) में शामिल हुए और अध्यक्ष, रेलवे बोर्ड के स्तर तक पहुँचे। श्री बी.के. चतुर्वेदी (1969) हिंदुस्तान मोटर्स लिमिटेड के अध्यक्ष और कार्यकारी निदेशक थे।
1970 के दशक में जिन लोगों ने उत्तीर्ण किया उनमें प्रम
लेफ्टिनेंट जनरल सर हेरोल्ड विलियम्स, के.बी.ई., सी.बी. के नाम का उल्लेख किए बिना इस विश्वविद्यालय से संबंधित कोई भी विवरण पूरा नहीं हो सकता। वह 50 से अधिक वर्षों से इसके साथ जुड़े रहे। जानपद अभियांत्रिकी के प्रोफेसर (1936-38) और सीनेट के सदस्य (1949-55), लेफ्टिनेंट जनरल विलियम्स ने संस्थान की प्रगति में गहरी रुचि ली। वे 1948-55 तक भारतीय सेना के इंजीनियर-इन-चीफ और 1955-62 तक सी.बी.आर.आई., रुड़की के निदेशक थे। उन्होंने भारत को अपने घर के रूप में अपनाया और रुड़की को विशेष रूप से प्यार करते थे। रुड़की ही उनका शांतिनिकेतन, उनका सेवाग्राम और अंत में उनकी समाधि स्थली बनी। उन्हें गंगा नहर के पार पुराने एंग्लो इंडियन कब्रिस्तान में दफनाया गया है। बंगाल सैपर्स, उनकी पुरानी रेजिमेंट, हर साल अक्टूबर की 17 तारीख को, जो उनकी पुण्यतिथि है, उनकी कब्र पर गार्ड ऑफ ऑनर देती है। उनका निधन 1971 में मसूरी में हुआ था।
विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद मौजूदा शाखाओं में प्रवेश और नई शाखाओं को जोड़ने के कारण स्नातक होने वाले छात्रों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई। इस प्रकार इस प्रतिष्ठित संस्थान से अत्यधिक प्रतिभाशाली युवाओं की एक प्रामाणिक धारा निकली है। उन्होंने भारत और विदेशों में भी उद्योग, सरकार और शिक्षा में प्रमुख पदों पर दायित्व निर्वाह किया है, और मातृ संस्थान की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाना लगातार जारी रखा है।